गुरु गोरक्षनाथ जी के प्रति श्रद्धा और “अलख निरंजन” का उद्घोष।
॥ अलख निरंजन ॥ · राजस्थान नाथ समाज
नाथ संप्रदाय
उद्गम एवं इतिहास
आदिनाथ शिव की आध्यात्मिक परंपरा से गुरु गोरक्षनाथ जी तक — नवनाथ, योग दर्शन, भारत में प्रसार और राजस्थान के नाथ/योगी समाज की विरासत को सरल चित्रों और प्रवाह-चार्ट से समझें।

नाथ कौन हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे समझें?
“नाथ” का अर्थ स्वामी, संरक्षक अथवा गुरु है। नाथ परंपरा भारतीय शैव, सिद्ध और योग धाराओं से जुड़ी है। इसकी धार्मिक स्मृति आदिनाथ शिव से शुरू होती है, जबकि ऐतिहासिक रूप से मठों, ग्रंथों और संगठित पंथों का विकास अलग-अलग शताब्दियों में हुआ।
आदिनाथ शिव से आरंभ
परंपरा के अनुसार भगवान शिव प्रथम गुरु हैं। मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ जी उस गुरु-ज्ञान की महान सिद्ध परंपरा के प्रमुख नाम हैं।
समय के साथ विकसित संप्रदाय
शोधकर्ता साहित्य, कला, मठों और अभिलेखों के आधार पर नाथ योगियों की कई शताब्दियों में विकसित परंपरा का अध्ययन करते हैं।
भगवान शिव और गुरु-सिद्धों की पवित्र उत्पत्ति कथाएँ धार्मिक परंपरा हैं; उन्हें किसी निश्चित आधुनिक ऐतिहासिक तारीख के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।
नाथ गुरु-परंपरा का सरल Flowchart
यह आध्यात्मिक गुरु-परंपरा का प्रसिद्ध स्वरूप है; इसे जैविक वंशावली या पूरी संस्थागत इतिहास-रेखा न समझें।
भगवान शिव — आदिनाथ
योग एवं आध्यात्मिक ज्ञान के मूल गुरु
गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी
सिद्ध, कौल और योग परंपराओं से जुड़ा नाम
गुरु गोरक्षनाथ जी
योग, गुरु-शिष्य परंपरा और लोकवाणी में अत्यंत प्रतिष्ठित
मत्स्येन्द्रनाथ जी से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में शिव–पार्वती संवाद के योगज्ञान का उल्लेख है। गुरु गोरक्षनाथ जी को कई नाथ शाखाएँ शिवस्वरूप या शिवावतार की आस्था से पूजती हैं। ये धार्मिक मान्यताएँ अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ भिन्न रूपों में मिलती हैं।
महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी
ज्ञान, साधना और गुरु-भक्ति के प्रतीक
राजस्थान के अनेक नाथ/योगी परिवार गुरु गोरक्षनाथ जी को इष्टदेव या परम श्रद्धेय गुरु मानते हैं। अनेक शाखाओं में उन्हें शिवस्वरूप कहा जाता है। उनके जीवनकाल और जन्मस्थान पर शोधकर्ताओं में मतभेद हैं; एक निश्चित ऐतिहासिक वर्ष सर्वमान्य नहीं है।
आत्मानुशासन, विवेक, अनुभव और योग्य गुरु के मार्गदर्शन का महत्व।
नाथ योगियों का ध्यान, श्वास-साधना और हठयोग के इतिहास से संबंध।
गोरखबानी और अन्य पदों के माध्यम से अनेक भाषाओं में विचारों का प्रसार।
नाथ परंपरा के अनुयायियों की स्थानीय रीति और इष्ट-आराधना एक जैसी नहीं होती। इस पृष्ठ पर राजस्थान के सभी परिवारों के लिए एक समान पूजा-विधि का दावा नहीं किया गया है।
नाथ परंपरा के 84 सिद्ध योगी कौन हैं?
नवनाथ के साथ चौरासी सिद्धों का स्मरण नाथ परंपरा की प्रमुख धार्मिक विरासत का अंग है।
नाथ समाज में “नवनाथ और चौरासी सिद्ध” का विशेष सम्मान है। सिद्ध ऐसे महान साधक या योगी के लिए प्रयुक्त शब्द है जिन्हें साधना में उच्च आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त मानी जाती है। परंपरा के अनुसार अनेक गुरुओं ने योग, ध्यान, आत्मज्ञान एवं गुरु-शिष्य संबंधों को आगे बढ़ाया।
अलग गिनती, परंपरा में समान महत्व
नवनाथों और चौरासी सिद्धों के नामों में कुछ सूचियों में समानता होती है। इन्हें हमेशा बिल्कुल अलग व्यक्तियों के दो समूह मानना सही नहीं है।
सभी सूचियाँ एक जैसी नहीं
नाथ, सिद्ध, क्षेत्रीय और बौद्ध वज्रयान ग्रंथों की सूचियों में नाम और क्रम बदलते हैं। किसी एक सूची को निर्विवाद अंतिम सूची नहीं कह सकते।
८४चौरासी सिद्ध योगियों के 84 नाम देखेंएक प्रकाशित हिंदी परंपरागत सूची • क्लिक करके खोलें+
नीचे दिए नाम एक प्रचलित हिंदी संकलन के अनुसार क्रमबद्ध हैं। कई नामों की वर्तनी और पहचान दूसरी परंपराओं में बदल सकती है; यह सभी नाथ पंथों की सर्वमान्य सूची नहीं है।
- 01सिद्ध चर्पतनाथ
- 02कपिलनाथ
- 03गंगानाथ
- 04विचारनाथ
- 05जालंधरनाथ
- 06श्रंगारिपाद
- 07लोहिपाद
- 08पुण्यपाद
- 09कनकाई
- 10तुषकाई
- 11कृष्णपाद
- 12गोविन्दनाथ
- 13बालगुंदाई
- 14वीरवंकनाथ
- 15सारंगनाथ
- 16बुद्धनाथ
- 17विभाण्डनाथ
- 18वनखंडिनाथ
- 19मण्डपनाथ
- 20भग्नभांडनाथ
- 21धूर्मनाथ
- 22गिरिवरनाथ
- 23सरस्वतीनाथ
- 24प्रभुनाथ
- 25पिप्पलनाथ
- 26रत्ननाथ
- 27संसारनाथ
- 28भगवन्तनाथ
- 29उपन्तनाथ
- 30चन्दननाथ
- 31तारानाथ
- 32खार्पूनाथ
- 33खोचरनाथ
- 34छायानाथ
- 35शरभनाथ
- 36नागार्जुननाथ
- 37सिद्ध गोरिया
- 38मनोमहेशनाथ
- 39श्रवणनाथ
- 40बालकनाथ
- 41शुद्धनाथ
- 42कायानाथ
- 43भावनाथ
- 44पाणिनाथ
- 45वीरनाथ
- 46सवाइनाथ
- 47तुकनाथ
- 48ब्रह्मनाथ
- 49शीलनाथ
- 50शिवनाथ
- 51ज्वालानाथ
- 52नागनाथ
- 53गम्भीरनाथ
- 54सुन्दरनाथ
- 55अमृतनाथ
- 56चिड़ियानाथ
- 57गेलारावल
- 58जोगरावल
- 59जगमरावल
- 60पूर्णमल्लनाथ
- 61विमलनाथ
- 62मल्लिकानाथ
- 63मल्लिनाथ
- 64रामनाथ
- 65आम्रनाथ
- 66गहिनीनाथ
- 67ज्ञाननाथ
- 68मुक्तानाथ
- 69विरुपाक्षनाथ
- 70रेवणनाथ
- 71अडबंगनाथ
- 72धीरजनाथ
- 73घोड़ीचोली
- 74पृथ्वीनाथ
- 75हंसनाथ
- 76गैबीनाथ
- 77मंजुनाथ
- 78सनकनाथ
- 79सनन्दननाथ
- 80सनातननाथ
- 81सनत्कुमारनाथ
- 82नारदनाथ
- 83नचिकेता
- 84कूर्मनाथ
इस सूची के नामों का स्रोत: नाथ संप्रदाय और परमसिद्ध नौ नाथों का इतिहास — प्रकाशित हिंदी संकलन ↗। इसे धार्मिक परंपरा के एक संस्करण के रूप में पढ़ें।
चौरासी सिद्धों को समझने के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें
सिद्ध का सामान्य आशय है साधना में सिद्धि प्राप्त माना जाने वाला साधक; धार्मिक साहित्य में अलग-अलग अर्थ मिलते हैं।
‘चौरासी’ एक प्रतिष्ठित परंपरागत संख्या है। अलग ग्रंथों में कथाएँ और सूचियाँ अलग हैं; इसे आधुनिक जनगणना न मानें।
नहीं कहा जा सकता। अलग ग्रंथों में कुछ पूर्ववर्ती, समकालीन या बाद के सिद्धों के नाम आते हैं।
कुछ नाम बौद्ध वज्रयान के महासिद्धों की सूचियों में भी मिलते हैं। इससे ऐतिहासिक धार्मिक संपर्क समझे जाते हैं।
इस पेज पर दिए 84 नाम पारंपरिक संकलन के हैं; ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित 84 जीवनियों की अंतिम सूची नहीं। शोधार्थी अन्य सूचियों से तुलना करने के लिए James Mallinson के Nāth Sampradāya अध्ययन को भी देख सकते हैं।
नाथ दर्शन को छह बातों में समझें
गुरु एवं साधना
गुरु का मार्गदर्शन, आत्मानुशासन और व्यक्तिगत साधना नाथ परंपरा की महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं।
शिव और शक्ति
अनेक नाथ दार्शनिक धाराओं में शिव को परम चेतना तथा शक्ति को उसकी अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाता है।
हठयोग
शरीर, श्वास, मन और चेतना से जुड़े योग-अभ्यासों के विकास और प्रसार में नाथ योगियों का महत्वपूर्ण स्थान रहा।
पिंड और ब्रह्मांड
मानव शरीर को साधना का माध्यम मानकर व्यक्ति और व्यापक अस्तित्व के संबंध पर चिंतन किया जाता है।
संयम और विवेक
बाहरी दिखावे से अधिक मन, आचरण, विवेक और अनुभव को महत्व देने की शिक्षाएँ मिलती हैं।
लोकभाषा और वाणी
योग और जीवन के प्रश्नों को संस्कृत के साथ-साथ विभिन्न लोकभाषाओं, पदों और संवादों में व्यक्त किया गया।
हठयोग का इतिहास अनेक परंपराओं से जुड़ा है। इसे केवल एक ही गुरु द्वारा एक समय में आविष्कृत बताना सही नहीं होगा। कठिन योग-अभ्यास बिना प्रशिक्षित मार्गदर्शन के नहीं करने चाहिए।
बारह पंथ क्या हैं?
नाथ मठीय परंपराओं में बारह पंथों का उल्लेख मिलता है। इन्हें अलग गुरु-परंपराओं और साधना-संबंधी शाखाओं के रूप में समझ सकते हैं। नाम एवं वर्गीकरण ग्रंथ और क्षेत्र के अनुसार बदल सकते हैं।
धार्मिक शाखा, गुरु-दीक्षा या मठीय संबद्धता।
गृहस्थ परिवार की वंश-सामाजिक पहचान।
यह केवल एक प्रचलित नाम-सूची का रूप है। कुछ पंथों के नामों में वैकल्पिक वर्तनी या अन्य वर्गीकरण भी मिलते हैं।
नाथ परंपरा पूरे भारत में कैसे फैली?
यह विस्तार कोई एक सीधी यात्रा नहीं थी। अलग समयों में यात्रारत योगियों, शिष्यों, मठों, लोकगाथाओं, क्षेत्रीय साहित्य और स्थानीय संरक्षण के माध्यम से अनेक दिशाओं में परंपरा विकसित हुई।
उत्तर भारत
मठ, यात्रारत योगियों, गुरु-दीक्षा और धार्मिक-लोकपरंपराओं से नाथ पहचान का विस्तार हुआ।
पश्चिम भारत
मठों, स्थानीय आश्रमों, राजकीय संरक्षण और गृहस्थ नाथ/योगी समाज की परंपराओं से संबंध दिखाई देते हैं।
मध्य एवं दक्कन
भर्तृहरि की लोकगाथाएँ, योग-साहित्य तथा गहिनीनाथ–निवृत्तिनाथ से जुड़ी परंपराएँ उल्लेखनीय हैं।
पूर्वी भारत एवं हिमालय
सिद्ध-कौल साहित्य, गोपीचंद की कथाएँ और नेपाल की मत्स्येन्द्रनाथ परंपरा का सांस्कृतिक महत्व है।
यह क्षेत्रवार समझाने वाला शैक्षिक चार्ट है, किसी एक गुरु की प्रमाणित यात्रा-मार्ग रेखा नहीं। नेपाल सहित दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रों में भी संबंधित परंपराएँ मिलती हैं।
राजस्थान में नाथ परंपरा का इतिहास
जोधपुर एवं महामंदिर
महाराजा मानसिंह (1803–1843) के समय नाथ गुरुओं को महत्त्वपूर्ण संरक्षण मिला। जोधपुर की चित्रकला तथा योग-संबंधी पांडुलिपियाँ इस इतिहास के उल्लेखनीय स्रोत हैं। महामंदिर इस विरासत से जुड़ा प्रमुख स्थल है।
अलवर और भर्तृहरि परंपरा
राजा भर्तृहरि की वैराग्य संबंधी कथाएँ राजस्थान की धार्मिक-लोकस्मृति में प्रमुख हैं। इनके हर प्रसंग को दस्तावेज़ित ऐतिहासिक घटना मानने के बजाय लोकपरंपरा के रूप में पढ़ना चाहिए।
भर्तृहरि–गोपीचंद की वाणी
राजस्थान के नाथ कथावाचकों ने इन कथाओं को लोकभाषा में पीढ़ियों तक जीवित रखा। घाटियाली के गृहस्थ नाथ कथाकार मधु नटिसार नाथ पर किया गया शोध इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
संन्यासी और गृहस्थ नाथ समाज
नाथ परंपरा में धार्मिक दीक्षा लेकर मठीय या त्यागमय जीवन अपनाने वाले योगी भी रहे हैं और परिवार के साथ रहने वाले गृहस्थ नाथ/योगी समुदाय भी। दोनों की पहचान संबंधित हो सकती है, परंतु दोनों की सामाजिक जीवन-पद्धति अलग है।
मठ • दीक्षा • साधना
गुरु गद्दी, शिष्य प्रशिक्षण, आश्रम, भ्रमण और आध्यात्मिक अभ्यास से संबंधित पहचान।
परिवार • कुल • सामाजिक जीवन
परिवार, स्थानीय परंपराएँ, आजीविका, संस्कार, लोकसाहित्य तथा बदलती सामाजिक संस्थाएँ।
सभी नाथ/योगी परिवारों की जैविक वंशावली को एक ही गुरु का प्रत्यक्ष वंश बताने का प्रमाण नहीं है। आध्यात्मिक गुरु-वंश और पारिवारिक वंशावली अलग विषय हैं।
इतिहास की आसान समयरेखा
शैव, सिद्ध और योग धाराएँ
नाथ परंपरा के बनने से पहले भी भारतीय उपमहाद्वीप में विविध शैव, सिद्ध, योग और तांत्रिक धाराएँ विद्यमान थीं।
प्रमुख सिद्ध आचार्यों का दौर
मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ से जुड़े साहित्यिक-ऐतिहासिक संकेत मिलते हैं; सटीक जीवनकाल विवादित है।
भाषाई एवं योग साहित्य
मराठी, कन्नड़, हिंदी, बंगाली आदि स्रोतों में संबंधित परंपराएँ, कथाएँ और योग विषय विकसित हुए।
पंथ एवं संस्थागत पहचान
संगठित नाथ पंथों, मठों और गुरु परंपराओं का स्पष्ट वर्णन अधिक उपलब्ध होने लगता है।
जोधपुर में महाराजा मानसिंह
नाथ गुरुओं को राजकीय संरक्षण; योग-दर्शन संबंधी पांडुलिपियों और कलाकृतियों का निर्माण।
समाज एवं विरासत का संरक्षण
गृहस्थ नाथ परिवार, आश्रम, लोकवाणी, शिक्षा और सामाजिक संगठनों का इतिहास आगे भी संकलित किया जा सकता है।
नाथ साहित्य में क्या पढ़ें?
गोरखबानी / गोरखवाणी
गुरु गोरख के नाम से प्रचलित पद, सबद और संवाद; प्रत्येक रचना की ऐतिहासिक प्रामाणिकता अलग हो सकती है।
गोरक्षशतक और संबंधित ग्रंथ
नाथ योग परंपरा से संबंधित साधना-साहित्य। सभी रचनाओं का मूल लेखक निर्विवाद रूप से निश्चित नहीं।
सिद्धसिद्धांतपद्धति
नाथ दर्शन, शरीर और ब्रह्मांड तथा योग से संबंधित विचारों वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ।
भर्तृहरि और गोपीचंद
राजस्थान सहित अनेक क्षेत्रों में प्रचलित वैराग्य, दीक्षा और सामाजिक प्रश्नों से जुड़ी लोककथाएँ।
गुरु गोरख वाणी प्रकाशित करते समय शब्दशः पाठ के साथ उसका स्रोत, संस्करण और सरल हिंदी अर्थ देना उचित होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
01नाथ संप्रदाय की शुरुआत कब हुई?+
धार्मिक मान्यता आदिनाथ शिव से परंपरा जोड़ती है। ऐतिहासिक रूप से नाथ नाम की परंपराओं का विकास कई शताब्दियों में हुआ; एक सर्वमान्य स्थापना-वर्ष उपलब्ध नहीं है।
02गुरु गोरक्षनाथ जी कब हुए थे?+
उनके जन्मकाल और जन्मस्थान पर विद्वानों में मतभेद हैं। लगभग मध्यकालीन अवधि से उनके संबंध का अध्ययन किया जाता है, लेकिन निश्चित जन्मवर्ष प्रमाणित नहीं है।
03क्या नवनाथों की सभी जगह एक ही सूची है?+
नहीं। महाराष्ट्र, राजस्थान और अन्य क्षेत्रीय परंपराओं तथा ग्रंथों में नामों और क्रम में बदलाव मिलता है। यहाँ एक प्रचलित सूची उदाहरण के रूप में दिखाई गई है।
04बारह पंथ और गोत्र एक ही हैं?+
नहीं। पंथ मुख्यतः साधना और गुरु-दीक्षा से जुड़ी धार्मिक शाखा है; गोत्र अथवा पारिवारिक वंश पहचान अलग सामाजिक विषय है।
05क्या सभी गृहस्थ नाथ परिवार संन्यासी हैं?+
नहीं। नाथ परंपरा से जुड़े संन्यासी मठीय जीवन जी सकते हैं, जबकि गृहस्थ नाथ/योगी परिवार सामान्य पारिवारिक और सामाजिक जीवन जीते हैं।
06गुरु गोरख वाणी में कौन-से शब्द वास्तव में गुरुजी के हैं?+
कई रचनाएँ गुरु गोरख के नाम से प्रचलित हैं, लेकिन हर पद का मूल रचनाकाल और लेखक एक समान प्रमाणित नहीं है। मूल पाठ, संस्करण और शोध-स्रोत देखकर उद्धरण प्रकाशित करना उचित है।
प्रमुख पुस्तकें एवं शोध-स्रोत
यह पेज सामान्य पाठक के लिए संक्षिप्त और चित्रमय परिचय है। विस्तार से अध्ययन करने के लिए नीचे दिए विद्वत् और संग्रहालय स्रोत उपयोगी हैं।
- 84 सिद्धों की एक प्रचलित हिंदी नामावली — Religion World ↗84 नामों का एक परंपरागत संकलन; अन्य ग्रंथों में वैकल्पिक नाम और क्रम मिल सकते हैं
- IGNOU — सिद्ध एवं नाथ साहित्य ↗चौरासी सिद्ध और नवनाथ का शैक्षिक परिचय
- Oxford Bibliographies — Nātha Sampradāya ↗संप्रदाय के इतिहास, शब्दार्थ, क्षेत्रीय विस्तार और शोध संबंधी मतभेद
- James Mallinson — Nāth Sampradāya (SOAS) ↗प्रारंभिक साहित्य, ऐतिहासिक विकास, योग और संगठित परंपरा
- Smithsonian — Yogic Identities ↗राजस्थान के जोधपुर, मानसिंह, महामंदिर और नाथ चित्रकला
- Ann Grodzins Gold — A Carnival of Parting ↗राजस्थान के गृहस्थ नाथ कथाकार एवं भर्तृहरि–गोपीचंद लोकगाथाएँ
- Asian Art Museum — Jodhpur Nath yogi painting ↗1824 के आसपास के जोधपुर योगी चित्रण का संग्रहालय अभिलेख
स्थानीय मान्यताओं और नवनाथ/बारह पंथों की सूचियों में क्षेत्रीय भिन्नता हो सकती है। नई शोध-सामग्री मिलने पर यह पृष्ठ अपडेट किया जाना चाहिए।